ऋषिकेश : वसंत पंचमी हिंदू पंचांग के अनुसार माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाने वाला एक अत्यंत शुभ पर्व है. यह दिन ज्ञान, विद्या, संगीत और कला की देवी मां सरस्वती को समर्पित होता है. वसंत पंचमी को वसंत ऋतु के आगमन का संकेत भी माना जाता है, जब प्रकृति में नई ऊर्जा, हरियाली और उल्लास देखने को मिलता है.
साल 2026 में वसंत पंचमी का पर्व 23 जनवरी को मनाया जाएगा. इस दिन पीले रंग का विशेष महत्व होता है, क्योंकि यह रंग समृद्धि, सकारात्मकता और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है. देश के अलग-अलग हिस्सों में यह पर्व विविध परंपराओं के साथ मनाया जाता है, लेकिन उत्तराखंड के ऋषिकेश स्थित भरत मंदिर में वसंत पंचमी का उत्सव एक अलग ही आध्यात्मिक और ऐतिहासिक पहचान रखता है.
भगवान विष्णु को समर्पित मंदिर
ऋषिकेश का भरत मंदिर न केवल एक प्राचीन धार्मिक स्थल है, बल्कि यह मंदिर भारतीय इतिहास और पौराणिक कथाओं से भी गहराई से जुड़ा हुआ है. त्रिवेणी घाट रोड पर स्थित यह मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है. लोकल 18 के साथ बातचीत के दौरान पुजारी धर्मानंद शास्त्री ने बताया कि मान्यता है कि इस स्थान पर महान ऋषि रैभ्य ने कठोर तपस्या की थी. उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें एक वृद्ध ब्राह्मण के रूप में दर्शन दिए थे. यही कारण है कि इस मंदिर को विशेष आध्यात्मिक ऊर्जा से परिपूर्ण माना जाता है.
वसंत पंचमी के दिन पीठासीन देवता स्थापित
पौराणिक कथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में भगवान राम के छोटे भाई भरत ने इस मंदिर की स्थापना की. इसी वजह से इस मंदिर को भरत मंदिर कहा जाता है. समय के साथ यह मंदिर भारतीय सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण केंद्र बन गया. बाद में आदि गुरु शंकराचार्य ने इस प्राचीन मंदिर का पुनर्निर्माण कराया और इसे एक भव्य स्वरूप प्रदान किया. कहा जाता है कि वसंत पंचमी के शुभ दिन ही उन्होंने यहां पीठासीन देवता की मूर्ति की दोबारा स्थापना की थी, तभी से इस दिन का महत्व और भी बढ़ गया.
वसंत पंचमी के अवसर पर भरत मंदिर में विशेष धार्मिक अनुष्ठान किए जाते हैं. सुबह से ही मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ने लगती है. विधि-विधान से पूजा, मंत्रोच्चार और धार्मिक रस्मों का आयोजन होता है. इस दिन का सबसे प्रमुख आकर्षण भव्य जुलूस होता है, जो मंदिर परिसर से निकलकर शहर के प्रमुख मार्गों से गुजरता है. इस जुलूस में भगवान विष्णु की शोभायात्रा निकाली जाती है, जिसमें संत, महंत, स्थानीय श्रद्धालु और दूर-दराज से आए भक्त बड़ी संख्या में शामिल होते हैं. ढोल-नगाड़ों की गूंज, भक्ति संगीत और जयकारों से पूरा वातावरण आध्यात्मिक ऊर्जा से भर जाता है.
उत्तराखंड : वसंत पंचमी पर यह मंदिर क्यों बन जाता है आस्था का केंद्र?
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