देहरादून: हाल ही में इंदौर में दूषित पानी के कारण हुई मौतों ने यह साफ कर दिया है कि स्वच्छता के दावों के बीच जल प्रबंधन की सच्चाई कितनी कमजोर है. यह संकट केवल इंदौर तक सीमित नहीं है. उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भी हालात चिंताजनक होते जा रहे हैं. कभी जीवनदायिनी कही जाने वाली रिस्पना, बिंदाल और सुसुआ नदियां आज ज़हरीले नालों में बदलती जा रही हैं.
इंदौर त्रासदी से लेना होगा सबक
नदियों की सफाई और संरक्षण पर काम करने वाली मेड संस्था से जुड़े प्रिंस कपूर ने बताया कि उनकी संस्था के स्वयंसेवक हर रविवार देहरादून की नदियों में सफाई अभियान चलाते हैं. इस दौरान उन्हें नदियों में भारी मात्रा में कूड़ा-कचरा देखने को मिलता है. कई बार तमसा नदी के पास मृत जलीय जीव भी नजर आते हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि हमारी जैव विविधता पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है.
उन्होंने बताया कि जनवरी 2026 की शुरुआत में इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में ड्रेनेज लाइन का पानी पीने की पानी की पाइपलाइन में मिल गया था. इसके चलते सैकड़ों लोग डायरिया और गंभीर संक्रमण की चपेट में आ गए और कई लोगों की मौत हो गई. प्रिंस कपूर का कहना है कि देहरादून की स्थिति भी इससे अलग नहीं है, क्योंकि यहां की नदियां लगातार प्रदूषित होती जा रही हैं.
देहरादून की नदियों का दम घोंटता प्रदूषण
देहरादून की हालत अब इंदौर से भी ज्यादा भयावह होती जा रही है. रिस्पना और बिंदाल, जो कभी दून घाटी की पहचान थीं, आज शहर का सीवेज और कचरा ढोने का जरिया बन चुकी हैं. वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार इन नदियों का पानी अब नहाने तो दूर, छूने लायक भी नहीं बचा है. कई जगहों पर पानी में हानिकारक बैक्टीरिया की मात्रा तय मानक से 76 गुना तक पाई गई है.
सुसुआ नदी की स्थिति भी बेहद चिंताजनक है. इसका Biochemical Oxygen Demand यानी BOD स्तर 20 से 30 mg/l तक पहुंच चुका है, जबकि सुरक्षित स्तर 3 mg/l से कम होना चाहिए. प्रदूषण का सबसे बड़ा कारण सीवेज डंपिंग है. सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट होने के बावजूद शहर का 40 प्रतिशत से अधिक बिना उपचारित सीवेज सीधे नदियों में गिराया जा रहा है. रिस्पना और बिंदाल के किनारे हजारों अवैध बस्तियां बस चुकी हैं, जहां से निकलने वाला गंदा पानी सीधे नदी में पहुंचता है. वहीं सेलाकुई और मोहब्बेवाला जैसे औद्योगिक क्षेत्रों का कचरा सुसुआ नदी को और ज्यादा ज़हरीला बना रहा है.
जलीय और वन्यजीवों पर भी गहराता खतरा
नदियों का प्रदूषण केवल इंसानों के लिए ही नहीं, बल्कि जलीय और वन्यजीवों के लिए भी बड़ा खतरा बन चुका है. रिस्पना और बिंदाल आगे जाकर सुसुआ नदी में मिलती हैं, जो राजाजी नेशनल पार्क के बीच से होकर गुजरती है. बढ़ते प्रदूषण के कारण मछलियों और अन्य जलीय जीवों की कई प्रजातियां तेजी से खत्म हो रही हैं. पानी में ऑक्सीजन की कमी के चलते मछलियां दम तोड़ रही हैं.
सुसुआ नदी का पानी हाथी, बाघ और अन्य जंगली जानवरों के लिए पीने का प्रमुख स्रोत है. ज़हरीला पानी पीने से इन जीवों में किडनी और लीवर से जुड़ी बीमारियां बढ़ रही हैं. इससे वन्यजीव संरक्षण पर भी गंभीर संकट खड़ा हो गया है.
अब भी नहीं चेते तो हालात और बिगड़ेंगे
इंदौर की घटना एक चेतावनी है कि अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो देहरादून जैसे शहरों को भी ऐसे ही हालात का सामना करना पड़ सकता है. नदियों की सफाई, सीवेज के सही उपचार और अवैध अतिक्रमण पर रोक बेहद जरूरी है. वरना आने वाले समय में शुद्ध पानी केवल सपना बनकर रह जाएगा और इसका खामियाजा इंसान के साथ-साथ प्रकृति को भी भुगतना पड़ेगा.
ज़हरीले नालों में बदलती जा रही देहरादून जीवनदायिनी, इंसानों के साथ वन्यजीवों पर भी छाया संकट
Leave a Comment
Leave a Comment

