नैनीताल: उत्तराखंड हाईकोर्ट ने कानूनी प्रक्रिया में एक बड़े बदलाव को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया है कि 1 जुलाई 2024 के बाद शुरू हुई सभी आपराधिक कार्यवाहियों में ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (बीएनएसएस) का पालन अनिवार्य है. न्यायमूर्ति आलोक महरा की पीठ ने देहरादून की एक निचली अदालत में चल रही शिकायतों और सम्मन आदेशों पर अंतरिम रोक लगा दी है. क्योंकि वहां पुराने कानून (सीआरपीसी) के तहत कार्यवाही की जा रही थी.
यह मामला भारतीय मानक ब्यूरो (बीआईएस) अधिनियम, 2016 की धारा 17(1)(ए) और 29(3) के उल्लंघन से जुड़ा है. जिसमें देहरादून की कम्पनी इंस्टकार्ट प्रा. लिमिटेड के खिलाफ मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, देहरादून की अदालत में ब्यूरो की ओर से शिकायत दर्ज की गई थी. मजिस्ट्रेट ने 13 जून 2025 को मामले का संज्ञान लिया और आरोपियों के खिलाफ सम्मन और बाद में गैर-जमानती वारंट जारी किए. आवेदकों ने इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि यह पूरी प्रक्रिया कानूनी रूप से दोषपूर्ण है.
याची के अधिवक्ता ने अदालत में दलील दी कि चूंकि यह मामला 1 जुलाई 2024 के बाद का है, इसलिए इस पर ‘भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता’ (बीएनएसएस) लागू होनी चाहिए थी. उन्होंने तर्क दिया कि बीएनएसएस की धारा 223(1) के तहत, मजिस्ट्रेट को संज्ञान लेने से पहले आरोपी को सुनवाई का अवसर देना अनिवार्य है, लेकिन निचली अदालत ने निरस्त हो चुके ‘दंड प्रक्रिया संहिता, 1973’ (सी आर पी सी) के पुराने प्रावधानों का पालन किया, जो अब कानूनन मान्य नहीं हैं.
न्यायमूर्ति आलोक महरा ने माना कि जब नया कानून लागू हो चुका है, तो पुरानी प्रक्रिया अपनाना न्यायोचित नहीं है. कोर्ट ने कहा कि संज्ञान लेने से पहले सुनवाई का अवसर न देना एक गंभीर प्रक्रियात्मक चूक है, जिसकी जांच की जानी आवश्यक है. जिसके बाद कोर्ट ने आगामी सुनवाई तक सीजेएम के आदेश पर रोक लगा दी है.
उत्तराखंड : हाईकोर्ट ने निचली अदालत के आदेशों पर लगाई रोक, जानिए वजह
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