
हरिद्वार। दौलतपुर क्षेत्र में प्रस्तावित ‘मैंगो फार्म’ प्रोजेक्ट को लेकर भूमि के वास्तविक आकार, लेआउट स्वीकृति, पेड़ों की स्थिति और आवश्यक अनुमतियों को लेकर कई गंभीर सवाल सामने आए हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार मौके पर प्रोजेक्ट का क्षेत्रफल करीब 24 बीघा से अधिक बताया जा रहा है, जबकि स्वीकृत लेआउट करीब 9 बीघा का ही होने की बात सामने आ रही है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मौके पर कुल भूमि का बड़ा हिस्सा स्वीकृत लेआउट से बाहर दिखाई देता है, तो पूरे प्रोजेक्ट की वास्तविक स्थिति क्या है? क्या स्वीकृत लेआउट और मौके पर विकसित किए जा रहे क्षेत्र का मिलान किया गया है? और यदि किया गया है, तो संबंधित विभागों की रिपोर्ट क्या कहती है?
9 बीघा की स्वीकृति, मौके पर 24 बीघा से ज्यादा जमीन?
मामले में दावा किया जा रहा है कि मौके पर लेआउट का कुल क्षेत्रफल 24+ बीघा है, जबकि HRDA से करीब 9 बीघा का लेआउट स्वीकृत है। यानी कथित तौर पर स्वीकृत क्षेत्र कुल भूमि का लगभग 35 प्रतिशत ही है।
ऐसे में सवाल उठता है कि शेष भूमि का उपयोग किस उद्देश्य से किया जा रहा है? क्या उस हिस्से में भी सड़क, प्लॉट, विकास कार्य अथवा अन्य निर्माण प्रस्तावित हैं? यदि हां, तो उसके लिए किस विभाग से अनुमति ली गई है?
RERA पंजीकरण को लेकर भी सवाल
प्रोजेक्ट को लेकर दूसरा महत्वपूर्ण सवाल RERA पंजीकरण का है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार ‘मैंगो फार्म’ प्रोजेक्ट का RERA पंजीकरण सामने नहीं आता।
ऐसे में संबंधित प्राधिकरण और कॉलोनाइज़र को स्पष्ट करना चाहिए कि क्या यह परियोजना RERA के दायरे में आती है? यदि आती है तो पंजीकरण क्यों नहीं कराया गया? और यदि पंजीकरण आवश्यक नहीं है, तो उसका वैधानिक आधार क्या है?
मौके पर मौजूद आम के पेड़, फिर कैसे आगे बढ़ी प्रक्रिया?
मामले का सबसे गंभीर पहलू मौके पर मौजूद आम के पेड़ों से जुड़ा बताया जा रहा है। जानकारी के अनुसार साइट पर अभी भी आम के पेड़ मौजूद हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या लेआउट स्वीकृत किए जाने से पहले मौके का वास्तविक भौतिक सत्यापन किया गया था? यदि निरीक्षण हुआ था, तो निरीक्षण रिपोर्ट में पेड़ों की स्थिति का उल्लेख है या नहीं?
इसके अलावा जिन पेड़ों को हटाया या काटा गया है, उनके संबंध में वन विभाग अथवा अन्य सक्षम प्राधिकारी से आवश्यक अनुमति ली गई थी या नहीं—यह भी जांच का विषय है।
तहसील की 143 प्रक्रिया पर भी सवाल
प्रोजेक्ट के लिए भूमि की धारा 143 से संबंधित कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यदि मौके पर वास्तविक भूमि की स्थिति, पेड़ों की संख्या और भूमि उपयोग का पर्याप्त सर्वे किए बिना प्रक्रिया आगे बढ़ी, तो यह गंभीर प्रशासनिक जांच का विषय हो सकता है।
क्या तहसील स्तर पर मौके का विधिवत सर्वे कराया गया था?
क्या सर्वे रिपोर्ट में पेड़ों और पूरे भू-भाग का विवरण दर्ज है?
क्या राजस्व अभिलेख और मौके की वास्तविक स्थिति का मिलान किया गया?
इन सवालों का जवाब संबंधित राजस्व अधिकारियों को देना चाहिए।
HRDA की भूमिका भी सवालों के घेरे में
यदि मौके पर कुल भूमि 24 बीघा से अधिक है और स्वीकृत लेआउट केवल 9 बीघा का है, तो HRDA को यह स्पष्ट करना चाहिए कि लेआउट स्वीकृति किस भूमि और किस वास्तविक साइट स्थिति के आधार पर दी गई।
क्या HRDA की टीम ने मौके का भौतिक निरीक्षण किया था?
यदि किया था तो निरीक्षण की तारीख क्या थी?
क्या निरीक्षण रिपोर्ट में आम के पेड़ों की मौजूदगी दर्ज की गई?
और यदि पेड़ मौजूद थे, तो आवश्यक अनुमति और पर्यावरणीय/वन संबंधी अनुपालनों की जांच किस स्तर पर की गई?
कॉलोनाइज़र की भी जवाबदेही तय हो
सिर्फ अधिकारियों से सवाल करना पर्याप्त नहीं होगा। प्रोजेक्ट विकसित करने वाले कॉलोनाइज़र की भी जवाबदेही तय होनी चाहिए।
कॉलोनाइज़र को सार्वजनिक रूप से स्पष्ट करना चाहिए कि—
- कुल भूमि कितनी है?
- कितनी भूमि का लेआउट स्वीकृत है?
- क्या पूरा प्रोजेक्ट RERA में पंजीकृत है?
- मौके पर कितने पेड़ मौजूद थे और कितने हटाए गए?
- हटाए गए पेड़ों के लिए किस सक्षम विभाग से अनुमति ली गई?
- स्वीकृत 9 बीघा के अतिरिक्त भूमि पर क्या विकास कार्य प्रस्तावित हैं?
- तहसील और HRDA के निरीक्षण की रिपोर्ट क्या कहती है?
अब जांच की जरूरत
मामला केवल एक लेआउट की स्वीकृति का नहीं है। इसमें राजस्व रिकॉर्ड, वास्तविक भूमि क्षेत्रफल, HRDA की स्वीकृति, RERA अनुपालन, पेड़ों की स्थिति और वन विभाग की अनुमति—इन सभी पहलुओं की स्वतंत्र जांच जरूरी दिखाई देती है।
प्रशासन को चाहिए कि मौके का संयुक्त भौतिक सत्यापन कराए और तहसील, HRDA, वन विभाग तथा अन्य संबंधित विभागों की रिपोर्ट का आपस में मिलान किया जाए।
यदि सभी प्रक्रियाएं नियमों के मुताबिक हुई हैं तो संबंधित विभागों और कॉलोनाइज़र को दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। वहीं यदि स्वीकृत लेआउट और मौके की स्थिति में अंतर पाया जाता है या आवश्यक अनुमतियों के बिना पेड़ हटाए गए हैं, तो जिम्मेदारी तय कर नियमानुसार कार्रवाई की जानी चाहिए।
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—24+ बीघा की जमीन पर 9 बीघा का लेआउट आखिर कैसे और किन परिस्थितियों में स्वीकृत हुआ?

