ढाका: बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे हमलों ने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा है. ढाका यूनिवर्सिटी का जगन्नाथ हॉल इस वक्त एक अजीब खौफ के साये में है. यह हॉल पारंपरिक रूप से हिंदू, ईसाई और बौद्ध छात्रों का ठिकाना रहा है. हमारी टीम ने यहां के छात्रों से बात करके जमीनी हकीकत जानने की कोशिश की. यहां छात्रों के मन में भावनाओं का एक मिला-जुला ज्वार उमड़ रहा है.
कुछ छात्र कैंपस की चारदीवारी के भीतर खुद को सुरक्षित महसूस करते हैं. लेकिन बाहर कदम रखते ही उनकी रूह कांप जाती है. कई छात्र अब बांग्लादेश छोड़कर विदेश जाने का मन बना चुके हैं. उन्हें अपना भविष्य यहां पूरी तरह अंधकार में नजर आ रहा है. छात्रों की खामोशी यहां के बिगड़े हुए हालात की गवाही दे रही है. कट्टरपंथी ताकतों के बढ़ते प्रभाव ने इन युवाओं की मुस्कान छीन ली है.
क्या कैंपस की सुरक्षित दीवारों के बाहर कदम रखना अब जानलेवा साबित हो सकता है?
जगन्नाथ हॉल ढाका यूनिवर्सिटी का एक ऐसा हिस्सा है जो अल्पसंख्यकों के लिए एक टापू जैसा है. यहां बड़ी संख्या में हिंदू और ईसाई छात्र एक साथ रहते हैं. हमने यहां एक ईसाई छात्र से बात की जिसने अपनी पहचान गुप्त रखने की शर्त पर कई बातें बताईं. उसने कहा कि वह कैंपस के अंदर तो ठीक महसूस करता है. लेकिन बाहर निकलते ही उसे ‘एलियनेटेड’ यानी अलग-थलग महसूस होने लगता है.
क्या कट्टरपंथी भीड़ के डर से छात्र अब अपनी पहचान छिपाने को मजबूर हो रहे हैं?
यूनिवर्सिटी के गलियारों में सन्नाटा पसरा हुआ है. हमने कुछ और छात्रों से बात करने की कोशिश की लेकिन वे भाग खड़े हुए. सिर्फ एक छात्र ने हिम्मत जुटाकर अपनी बात रखी. उसने बताया कि आजकल कुछ लोग धर्म को लेकर बहुत ज्यादा कट्टर हो गए हैं. ये लोग खास तौर पर हिंदू छात्रों को निशाना बना रहे हैं. यह उनके लिए बहुत ही डरावना और चिंताजनक अनुभव है.
वह छात्र संगीत की पढ़ाई कर रहा है. संगीत तो सबको जोड़ता है लेकिन यहां स्थितियां इसे बांट रही हैं. वह कहता है कि मॉब अटैक यानी भीड़ के हमले की खबरें सुनकर उसे बहुत बुरा लगता है. उसे अपने ही देश में अजनबी जैसा महसूस होने लगा है. दीपू चंद्र दास जैसे लोगों पर हुए हमले यहां चर्चा का विषय हैं. छात्र कहते हैं कि वे अपनी आवाज उठाना चाहते हैं. लेकिन उन्हें डर है कि उनकी आवाज को दबा दिया जाएगा.
क्यों बांग्लादेश के सबसे प्रतिभाशाली युवा अब विदेश पलायन करने का मन बना रहे हैं?
ज्यादातर छात्रों से बात करने पर एक ही बात सामने आई. वे अब बांग्लादेश में नहीं रहना चाहते. वे यूरोप या किसी दूसरे देश में बसना चाहते हैं. उनका मानना है कि यहां की मौजूदा स्थिति रहने लायक नहीं बची है. कट्टरपंथ के बढ़ते प्रभाव ने उनकी सुरक्षा को खतरे में डाल दिया है. संगीत के छात्र ने भी कहा कि वह विदेश जाकर अपनी पढ़ाई पूरी करना चाहता है.
वह बांग्लादेश को अपना देश मानता है लेकिन यहां के हालात उसे डराते हैं. उसके पूर्वज यहीं पैदा हुए और यहीं रहे. लेकिन अब उसे लगता है कि यह देश उसे अपना नहीं मानता. अल्पसंख्यक छात्रों के मन में यह सवाल बार-बार आता है. क्या वे अपने पूर्वजों की जमीन पर कभी सुरक्षित रह पाएंगे. उन्हें लगता है कि उनकी सुरक्षा सरकार की प्राथमिकता नहीं है. कट्टरपंथी तत्व खुलेआम घूम रहे हैं और अल्पसंख्यकों को धमका रहे हैं.
क्या भारत इन डरे हुए छात्रों के लिए उम्मीद की एक नई किरण बन सकता है?
अल्पसंख्यक छात्र अक्सर भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देखते हैं. कई छात्र पश्चिम बंगाल और भारत के अन्य हिस्सों से ताल्लुक रखते हैं. उनके रिश्तेदार और जड़ें भारत में भी फैली हुई हैं. वे सोचते हैं कि क्या भारत उनके लिए अपने दरवाजे खोलेगा. उन्हें लगता है कि भारत में वे अपनी धार्मिक पहचान के साथ सुरक्षित रह सकते हैं. लेकिन अपनी मातृभूमि छोड़ना इतना आसान नहीं होता.
वे चाहते हैं कि बांग्लादेश में ही उन्हें सुरक्षा की गारंटी मिले. क्या यहां का लोकतंत्र उन्हें वह भरोसा दे पाएगा जिसकी उन्हें जरूरत है. भारत की भूमिका इस मामले में बहुत महत्वपूर्ण हो जाती है. पड़ोसी देश होने के नाते भारत की नजर इन हालातों पर बनी हुई है. छात्र चाहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस ओर ध्यान दे. वे केवल शांति और सुरक्षा के साथ अपनी पढ़ाई करना चाहते हैं.
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की स्थिति
बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की जनसंख्या में लगातार गिरावट देखी गई है. 1947 में विभाजन के समय पूर्वी बंगाल में हिंदुओं की आबादी लगभग 30 प्रतिशत थी. 2022 की जनगणना के अनुसार यह घटकर अब केवल 7.95 प्रतिशत रह गई है. रिपोर्टों के अनुसार पिछले कुछ वर्षों में मंदिरों पर हमलों की घटनाएं बढ़ी हैं. मानवाधिकार संगठनों ने भी अल्पसंख्यकों के खिलाफ बढ़ती हिंसा पर चिंता जताई है. जगन्नाथ हॉल जैसे स्थानों पर सुरक्षा बढ़ाना केवल एक तात्कालिक समाधान है. असली चुनौती समाज से कट्टरपंथ को मिटाना है ताकि हर नागरिक सुरक्षित महसूस कर सके.
क्या बांग्लादेश में हिंदुओं के लिए अब सिर्फ डर ही बचा है?
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