नई दिल्ली। महाराष्ट्र की महापरीक्षा का रिजल्ट आ रहा है। अब तक जारी नतीजों के आधार पर महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस डिस्टिंगशन मार्क्स से पास हो गए हैं। 25 साल बाद बृहन्मुंबई महानगरपालिका (BMC) से ठाकरे का दबदबा खत्म हो गया। इस बार उद्धव ने अपने चचेरे भाई राज ठाकरे के साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। उद्धव ने BMC चुनाव में बाला साहेब की कट्टर हिंदुत्व की जगह सॉफ्ट हिंदुत्व को अपनाया था, जिसे मुंबई की जनता ने नकार दिया।
शिवसेना यूबीटी के लिए मुंबई समेत 29 नगर निगमों का चुनाव बेहद अहम था। खासकर उद्धव ठाकरे पर BMC में 25 साल पुराना दबदबा बनाए रखने का दारोमदार था लेकिन उद्धव ने एक ‘गलती’ की और बीएमसी में उनका पूरा किला ढह गया। इस बार चुनाव में राज ठाकरे, उद्धव ठाकरे एक साथ हो गए लेकिन 25 साल बाद ठाकरे मुंबई की सत्ता से बाहर हो गए।
शिवसेना UBT की दुर्गति का विलेन कौन?
BMC की 227 सीटों पर अकेले बीजेपी 99 में आगे हैं और बीजेपी गठबंधन 130 सीटों पर आगे है। इसके मुकाबले शिवसेना UBT और एमएनएस का गठबंधन केवल 67 सीटों पर आगे चल रहा है।
मराठी अस्मिता के नाम पर नफरती पॉलिटिक्स के हीरे राज ठाकरे को महाराष्ट्र की जनता ने पूरी तरह से खारिज कर दिया है और उनके चक्कर में उद्धव ठाकरे भी अपना नुकसान कर बैठे। 25 साल बाद बीएमसी की सत्ता उद्धव ठाकरे के हाथों से जा रही है। क्या इसकी वजह ठाकरे ब्रदर्स का साथ आना है, जिसकी वजह से उत्तथर भारतीय वोटर्स उनके नाराज हो गए या 25 साल की एंटी इनकंबेंसी। आइए जानते हैं उद्धव की शिवसेना यूबीटी की दुर्गति क्यों हुई-
राज ठाकरे ने खराब किया खेल- महाराष्ट्र की राजनीति में राज ठाकरे की पहचान नफरती पॉलिटिक्स को लेकर ही रही है। राज ठाकरे उत्तवर भारतीयों को बिल्कु ल पसंद नहीं करते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि राज ठाकरे से हाथ मिलाकर उद्धव ठाकरे ने बड़ी गलती की। राज से हाथ मिलाते ही उद्धव से उत्तिर भारतीय वोटर छिटक गए और उद्धव ने अब अपने लंबे समय के कब्जे वाले बीएमसी पर भी नियंत्रण खो दिया।
कांग्रेस का साथ छोड़ राज ठाकरे को चुना- राज ठाकरे की पार्टी महाराष्ट नवनिर्माण सेना (MNS) पहले से ही कमजोर थी और ऐसे में उनके साथ जाने से उद्धव को कोई बड़ा फायदा नहीं हो सकता था। यह सब जानते हुए भी उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस का साथ छोड़कर राज ठाकरे चुना। इससे मुंबई के उत्तर भारतीय ठाकरे गठबंधन से दूर हो गए और बीजेपी-शिंदे गुट की ओर चले गए। कांग्रेस के साथ गठबंधन की बजाय MNS को चुनने का परिणाम ये हुआ कि अल्पसंख्यक वोटों से भी पार्टी हाथ धो बैठी।
BJP की रणनीति ठाकरे बंधुओं पर पड़ी भारी- ठाकरे ब्रदर्स अभी तक ‘मराठी मानुष’ की राजनीति करते नजर आए हैं। इस बार भी उनकी निर्भरता मराठी वोटों पर ही देखने को मिली। लेकिन मराठी वोटरों ने ही मुंह मोड़ लिया। सीएम देवेंद फडणवीस ने ना सिर्फ हिंदुत्व के मुद्दे को ठाकरे ब्रदर्स से छीनकर बीजेपी को हिंदुत्व का सोल गार्जियन बना दिया बल्कि मराठी अस्मिता की बात को लेकर भी ठाकरे ब्रदर्स की नैरेटिव को पंक्चर कर दिया। ठाकरे ब्रदर्स ने कहा था कि मुंबई का मेयर मराठी होगा लेकिन फडणवीस ने कहा था कि मुंबई का मेयर वही मराठी बनेगा जो हिंदू होगा। अब रिजल्ट भी यही बता रहा है यानि ठाकरे ब्रदर्स के मराठी कार्ड पर फडणवीस की हिंदुत्व वाली मराठी अस्मिता भारी पड़ी।
जनता से कनेक्ट टूटना, जनसभाओं की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस पर ज्यादा जोर- BMC चुनाव के दौरान जहां बीजेपी जमीन पर उतरी और उसके नेताओं ने कई रैलियां कीं, वहीं उद्धव ठाकरे और उसके नेता जनसभाओं की जगह प्रेस कॉन्फ्रेंस करते नजर आए। वे चुनाव प्रचार के दौरान ज्याददा लोगों तक अपनी आवाज नहीं पहुंचा सके। साथ ही ये आम धारणा भी बन चुकी है कि ठाकरे परिवार आम लोगों से मिलता जुलता नहीं है। जब उद्धव ठाकरे सत्ता में थे तो विधायकों तक का उनसे मिलना नहीं होता था। इस बार भी जनसभाओं की जगह उनका ध्यान प्रेस कॉन्फ्रेंस पर ज्यादा रहा जिसका उन्हें खामियाजा भुगतना पड़ा है।
25 साल की एंटी इनकंबेंसी- BMC को बाला साहेब ठाकरे की विरासत का आखिरी मजबूत केंद्र माना जाता था। पिछले 25 सालों से यह ठाकरे परिवार का मजबूत किला रहा है। माना जा रहा है कि 25 साल की एंटी इनकंबेंसी का भी उद्धव ठाकरे को नुकसान उठाना पड़ा है। अक्सर ऐसा देखने को मिलता है कि जब कोई पार्टी काफी समय से सत्तान में होती है, तो उसके खिलाफ एक माहौल बनने लगता है, यह एंटी इनकंबेंसी चुनाव नतीजों में देखने को मिलती है।
महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव में एक बार फिर भगवा रंग की जबरदस्त आंधी चली है। 29 नगर निगम वाले महाराष्ट्र में 24 जगह महायुति का मेयर बनना लगभग तय नजर आ रहा है जिस BMC का गढ़ बचाने के लिए ठाकरे ब्रदर्स साथ आए, वो किला भी 25 साल बाद ढह गया।
BMC चुनाव : क्या राज ठाकरे को गले लगाकर उद्धव ठाकरे ने कर दी बड़ी गलती?
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